Saturday, September 10, 2011

अंक - 13

लाई पवन
सोंधी मिट्टी की बास
तू आसपास ।

बचता रहा
झूठ की चादर ओढ़े
सच की धूप से ।

  -सत्यानन्द जावा

000

शीतल तरु
झाड़ रहे अंगार
अमलतास ।

-उर्मिला कौल

000

सूखे ताल में
उछल पड़ी मीन
घन घुमड़े ।

-रामकृष्ण विकलेश

000

संध्या बिल्ली
दबे पाँव चाट गयी
दूधिया धूप ।

-कृष्णलाल बजाज

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