Monday, May 18, 2020

अंक - 36

अंक - 36

16 May - 2020
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हाइकु कविताएँ

डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर

डा० स्टेला कुजूर वरिष्ठ शिक्षाविद हैं, आप दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय में उप शिक्षा निदेशक पद पर लम्बे समय तक कार्य करती रही हैं। स्टेला जी मूलतः झारखंड के आदिवासी क्षेत्र से हैं और अपने बलबूते पर जे एन यू से पढ़ाई पूरी की, लोकसाहित्य पर उनका शोधकार्य है। "ढेकी के बोल" उनका प्रकाशित हाइकु संग्रह है।

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                                                 -एक-

आँधी आते ही
शोर मचाती हवा
हुई उद्दण्ड
-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर
*

-दो-
अँगीठी पर
माँ खुद को पकाती
ख्वाब बुनती
-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर
*

-तीन-
जाने कब से 
मौन साधे बैठे हैं
घने जंगल
-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर
*

-चार-
तुम्हारा छाता
खूँटी पर टँगा है
चूहों का घर
-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर
*

-पाँच-
बेटी ने झेली
कोख से कब्र तक
अनन्त पीड़ा
-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर


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विभिन्न टिप्पणियाँ
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मैं समझता हूँ अच्छी हाइकु कविताओं और उन पर सार्थक चर्चा का जो यह कार्य व्योम जी ने प्रारम्भ किया है, उसके परिणाम बहुत सकारात्मक होंगे। हाइकु छोटे कलेवर की कविता ज़रूर है,लेकिन अर्थ- विस्तार में वह बहुत व्यापकता लिए हुए होती है। जो लोग इस बात का संज्ञान ले पायेंगे,वे हाइकु यात्रा में बहुत कुछ जोड़ पायेंगे।

-कमलेश भट्ट कमल
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-एक-

आँधी आते ही
शोर मचाती हवा
हुई उद्दण्ड
-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर
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इस हाइकु में हवा जो आमतौर पर सुखदायी बहती है , शीतल बयार कहलाती है ; यही आँधी का आश्रय पाकर उद्दंड हो जाती हैऔर शोर मचाते हुए विध्वंसकारी हो जाती है । यह हाइकु संगत के असर को रेखांकित करती है - बधाई ।
-रमेश कुमार सोनी


कदाचित ये हाइकु ये इशारा करता है कि  नटखट हवा को आंधी का साथ मिल जाने से और भी ज्यादा उद्दंड हो गई है यदि किसी भी बच्चें को बड़े का सपोर्ट मिल जाता है तो उसका भय खत्म हो जाता है और शैतानी बढ़ जाती हैं।
-अभिषेक जैन


दंगों और उन्हें उकसाने को लेकर लिखा गया यह हाइकु आज के परिवेश का यथार्थ चित्रण है।
ऐसे दृश्यों और उद्दण्डता को हाइकु में समा लेना, गहन संवेदनशीलता और अंतर्मन की पीड़ा का द्योतक है।
-नरेन्द्र श्रीवास्तव


ऐसे सामाजिक पहलू पर आघात हैं, जो समाज का एक तबका जैसे आँधी (झगड़ा-फसाद) की राह ताकते बैठा हैं और ऐसा मौका आते ही अपनी दुश्मनी का बदला लेता हैं।
 -तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे


किसी भी तरह की घोर विपत्ति के आने पर पूरी सृष्टि दहल जाती है। हल्के-हल्के बहने वाली हवाएँ भी अपना स्वभाव भूलकर प्रचंड रूप दिखाती है। जिस तरह शांत ठहरे जल में मात्र एक कंकर पूरे जलाशय में हलचल मचा देता है।
-सुधा राठौर


डॉक्टर सूरजमणि स्टेला कुजूर द्वारा रचित यह हाइकू अत्यंत ही गंभीर सन्देश और गूढ़ अर्थ लिए हुए है..जिस प्रकार हवा के तेज वेग का साथ पाकर सामान्य बहती हुई हवा भी प्रचंड और विनाशकारी रूप धारण कर लेती है उसी प्रकार गैर-  सामाजिक तत्व भी अपने अनुकूल परिस्थिया पकार उदंड और उग्र हो जाते है और समाज के शांति भंग करने का कोई मौका नहीं छोड़ते है...बहुत खूब ....समाज के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करता यह हाइकू है.
-एन के शर्मा


माँ  व अंगीठी  के संबंध का सटिक विशलेषण बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति  क्योकि नारी के अधिकांश  ख्वाब ऐसे समय  ही बुने जाते है।
-पूनम मिश्रा


 ऐसे तो हवा शांत बहती है,सबका मन हर लेती है।लेकिन हवा को आँधी का साथ मिल जाता है तो वह दुखदायी बन जाती है ऐसे ही समाज मे कुछ लोग असामाजिक तत्वों के साथ मिलकर नुकसान पहुँचाते है।
-नीलम अजित शुक्ला


हवा प्राणवायु है यह कण-कण में व्याप्त अदृश्य व अनंत में व्याप्त है। हवा के स्पर्श मात्र से शीतलता का अनुभव होता है। वायु के स्पर्श से तरुवर खुशी से झूमते हैं जब आँधी-तूफान आता है तब इसका विनाशकारी रूप दिखाई देता है,जो पेड़-पौधै वायु के स्पर्श से झूमते थे वे जड़ सहित उखड़ जाते हैं और जन जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।जीवन में हमेशा खुशियाँ नहीं रहती हैं दुखों का भी सामना करना पड़ता है। बेहतरीन व उत्कृष्ट हाइकु है।
-सविता बरई वीणा


भावप्रधान हाइकु। आँधी यहाँ "शक्ति"  का प्रतीक मालूम होता और हवा उसी का एक कोमल स्वरूप जिसकी ताकत कम है आँधी से । तो अक्सर ऐसा देखा गया हैविशेष कर राजनीति ,गुंडागर्दी के संदर्भ में किसी शक्तिशाली नेता या गुंडे का सहारा मिलते ही छोटे मोटे नेता या अराजक तत्व उनके दम पर उद्दंड हो जाते है। जैसे धीमे धीमे चलती हवा अचानक आँधी में बदल कर उत्पात मचाने लगती है। यहाँ एक और भाव जिससे मैं इसे जोड़ सके रही हूँ वो एक बच्चे का है। कुछ बच्चे सारा दिन शांत रहते है पर जैसे ही अपने पिता या माँ या दादा, अन्यथा दादी जिस से वो विशेष घुलामिला होता है उनके आते ही उन्हें देख कर मुखर, चंचल या उद्दंड हो जाता है।
-सुनीता अग्रवाल नेह


इस हाइकु को पढ़ते हुए एक शंका या जिज्ञासा ने जन्म लिया कि बगैर हवा के आंधी का क्या अस्तित्व ? क्योंकि अगर आंधी का शाब्दिक अर्थ देखें तो वो धूल भरी तेज हवा होगा। और इस शंका से परे इस हाइकु में  आदरणीय स्टेला जी ने बहुत खूबसूरती से हवा के रूप-अरूप के द्वारा बुरे व्यक्तित्व की संगत में अच्छे व्यक्त्वि का भी बुरा हो जाना  बताया है। साधुवाद स्टैला मैम को।
-आभा खरे


इस हाइकु का सभी ने अलग अर्थ निकाला हर अर्थ के संदर्भ में हाइकु पढ़ा तो वैसा ही प्रतीत हुआ. जहाँ तक मेरी बात है तो मुझे लगा कि हाइकुकार प्रिय के बिचोह में अपनी स्थिति बयान कर रहा है. यथा प्रिय की याद आंधी की तरह आई और मन जो पहले से विचलित था और अधिक उद्विग्न हो गया... इस अर्थ में हाइकु पढ़ती हूँ तो बड़ा सुंदर लगता है..
-बुशरा तबस्सुम


यह हाइकु बहुत ही अच्छा लिखा हुआ है। इसमें मुझे धनात्मकता की खुशबू भी आती है। हालांकि उद्दण्ड का अर्थ मनमानी करने वाला जिसको दंड का भय न हो होता है पर फिर भी यदि एक परिवर्तन लाना हो तो उसके लिये पहिले हवा तो चलनी ही चाहिए न। फिर यह जो हवा चली परिवर्तन नही ला सकती, इस हेतु एक आंधी की आवश्यकता तो होगी ही। बस यहीं वो धनात्मकता की ओर यह हाइकु मुझे आगे के दृश्य दिखा देता है। हाइकुकार डॉ स्टेला जी को इतनी बढ़िया रचना हेतु नमन।
-रामकुमार माथुर


संगति का प्रभाव इस हाइकु में दिखाई देता है। प्रचंड आंधी के प्रभाव में आकर हवा भी उद्दंड  बन जाती है इसलिए कहा भी जाता है कि कुसंगती से दूर रहना चाहिए सार्थक हाइकु।
-डॉ रमा द्विवेदी


आदरणीया आपका यह बेहतरीन हाइकु माँ के सागर से गहरे ममतामयी मन की लहरो को नापने की कोशिश करता प्रतीत होता है। आर्थिक स्थिति की दोनो परिस्थिति के आधार पर देखने पर भी सही सटीक अभिव्यक्ति।  -प्रेरणा माथुर


अत्यंत गहन मार्मिक तथ्यपरक कथ्य। मात्र सत्रह वर्णों में माँ की दिनचर्या से लेकर उसके जीवन से जुड़े से सभी आयाम, आशा,आकांक्षा, विश्वास, वेदना, संघर्ष, जिजीविषा, त्याग समर्पण आदि समस्त आयामों की सम्यक अभिव्यक्ति स्टेला जी की सशक्त कलम द्वारा हुई है। वह एक समर्थ हाइकुकार हैं। बहुत बधाई!
-मधु चतुर्वेदी


मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि अच्छा भला व्यक्ति भी कुसंगति के प्रभाव से उद्दंड या कहें कि बुरा बन जाता है। इसे हम परिवार समाज, राष्ट्र से जोड़ सकते हैं। दूसरे अर्थ में कहें तो गलत हाथों में पावर आ जाने से वैश्विक स्तर पर कोरोना जैसा कहर भी ढा जाता हैं।
-पुष्पा सिंघी


 प्रकृति को बख़ूबी समझने का नज़रिया, प्रकृति की ही तरह जीवन में भी जब विपत्ति आती है तो शोर के साथ उद्दण्ड हो जाती है।
-रीमा दीवान चड्ढा


आँधी नकारात्मकता का संदेश दे रही है।जब दुस्साहसी नृशंसता पर उतर आते है तब कुछ सज्जन भी उसमें शामिल हो जाते हैं। और विनाश लीला रचाने लगते है। बहुत सुन्दर हायकु।
-कमलेश चौरसिया



आते ही आम ज़िन्दगी में उथल-पुथल सी मच जाती है और तीव्र होने पर हम उद्दंड भी हो जाते है। विरोध करने लगते हैं।
-हेमा शंकर
आस्ट्रेलिया



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-दो-
अँगीठी पर
माँ खुद को पकाती
ख्वाब बुनती
-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर

 माँ, इस दुनिया में ईश्वर का दूसरा रुप है जिनके भरोसे किसी भी घर की नींव मज़बूत होती है । माँ की जिंदगी चूल्हे  के इर्द - गिर्द सिमटकर रह जाती है लेकिन इस बीच वह खुद को शक्तिशाली बनाती है (भाव - पकाना )और अपने भविष्य के सपने बुनती है । सुंदर हाइकु - बधाई ।
-रमेश कुमार सोनी


आदरणीय स्टेला जी का ये बेहद भावपूर्ण हाइकु है।माँ की जिंदगी चूल्हा चौका में बीत जाती है और
इसी रसोई के दायरे में रहकर ढेरो ख्वाब बुन लेती हैं
-अभिषेक जैन


दीनता और हीनता का मार्मिक दृश्य को अभिव्यक्त करता हाइकु , काव्य सृजन को सार्थक करता है।
पाठक के अंतर्मन को छूता है।
-नरेन्द्र श्रीवास्तव


ख्वाब बुनती, यानि चौका चूल्हा करते काफी समय होगया व बेटा भी बड़ा हो गया होगा, तो बहू को लाने का ख्वाब देखती हैं।
सुंदर हाइकु
-कैलाश कल्ला


गरीबी का एक एक दिन कष्ट में गुजारती, बच्चे पालती और अच्छे दिनों का ख्वाब देखती माँ इस हाइकु में दिखती हैं।
-तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे

बच्चों के सुख के लिए माँ खुद की भी परवाह नहीं करती। अपना सर्वस्व समर्पित कर देती है कि बच्चे बड़े होंगे तो सब कष्ट दूर हो जाएँगे। यह सोच उसमें उत्साह और हर्ष बढ़ाता है।
-सुधा राठौर


सारी जिंदगी माँ बच्चों का लालन पालन करती है,अपनी सारी जिंदगी रसोईघर तथा घर के जिम्मेदारियों के में बिता देती हैं इस आशय से की भविष्य में अच्छे दिन आएंगे ।
-नीलम अजित शुक्ला


जीवन के प्रति, परिवार के प्रति समर्पित होकर खुद को हमेशा भविष्य के लिए अच्छे सपने मे जीवित रखना।
अँगीठी पर माँ खुद को पकाती का दृश्य कठिन और विकट परिस्थतियों में भी आशा के साथ लगे रहना । सुन्दर हाइकु
-उमेश मौर्य


माँ को बच्चों से स्नेह का बंधन सारी उम्र रहता है,माँ बच्चों की खुशी के लिए हर कष्ट सहन करने के लिए तत्पर रहती है वह बच्चे की खुशी के लिए वर्षों रातों को जागकर बच्चों की सेवा में लगे रहती है और स्वयं भूखे-प्यासे रहकर हमेशा बच्चों की खुशी के प्रयास में लगे रहती है और बच्चों के सुखद जीवन के सपने बुनती है।
बेहतरीन व भावपूर्ण हाइकु।
-सविता बरई वीणा


संवेदना से भरपूर रचना। माँ अपने बच्चों के लिए कुछ भी करती है । मेहनत मजूरी करने वाली माँ भी अपने बच्चों के सुखद भविष्य के सपने देखती है।"अंगीठी पर खुद को पकाती माँ " मुझे उसी मेहनतकश माँ की आकृति लगती है जो अपने बच्चे के सुखद और बेहतर भविष्य के लिए रातदिन अपने आप को श्रम की भट्टी में पकाती रहती है।
-सुनीता अग्रवाल नेह 


बेहद मार्मिक हाइकु कविता। एक माँ के रूप में स्त्री पूरे जीवन भर,हर संभव वो सारे जतन करती रहती है ...जिसके द्वारा वो अपने बच्चों का सुंदर भविष्य सुनिश्चित कर सके। उन्हें बेहतर जीवन दे सके।
-आभा खरे


विशेषकर जब कोई हाइकु उस समय की परिस्तिथियों पर लिखा गया हो जब आधुनिक सुविधाओं का अभाव हो तो पाठक को भी उसी स्तिथि में स्वयं को रखना होता है। यह हाइकु मात्र 17 अक्षरों का भौतिक तौर पे है परंतु मुझे आत्मीय तौर पे यह सैंकड़ों अक्षरों से मिला रहा है। उदाहरण के लिए "खुद को पकाती" में ढेर सारे उन अनुभवों से पाठक रूबरू स्वतः ही हो जाता है जो कि माँ ने प्राप्त किये होंगे।माँ के  ""ख्वाब "" तक पहुंचने का साहस फिर उसके लिए कठिन हो जाता है। अतः पाठक को यह तीन पंक्तियाँ आत्मविभोर कर देती हैं। डॉ स्टेला जी की अभिव्यक्ति  पर इतनी सुंदर पकड हेतु बधाई।
-रामकुमार माथुर


 आदरणीया डा.स्टेला कुजूर जी का यह मर्मस्पर्शी हाइकु बहुत अर्थवान है। माँ की व्यथा, पारिवारिक दायित्व निर्वहन करने मे जो तपने के भाव हैं। इन पंक्तियों में ही माँ के जीवन के संघर्ष का फलक विस्तृत हो जाता है मनचाहे सपनों को साकार करने के लिए त्याग समर्पण समाहित है। एक अच्छे हाइकु की बधाई।
-शिव डोयले


मां बनना आसान नहीं है।तपना पड़ता है,हर क्षण शब्दों के तीर होते हैं कभी कभी तो ये तीर बच्चों के ही होते है। दैनिक संघर्ष अलग से रहता है। मन इन सब को झेलते हुए भविष्य के सुंदर मनमोहक ख्वाब भी बुनती रहती है।बहुत सुंदर हाइकु है। सूरजमणि स्टेला जी को बधाई।
-आशा पांडेय


स्टेला जी के हाइकुओं में अंतर्निहित सम्वेदन की नर्माहट और लोकभाव उन्हें औरों से अलग खड़ा करते हैं। बाहरी दुनिया से कटी और रसोई की परिधि में सिमटी,अँगीठी पर खाना पकाती माँ वास्तव में प्रेम और समर्पण की आँच में ख़ुद पक कर दृढ़ हो रही होती है। यही दृढ़ता उसे सपने देखने और अन्तत: उन्हें पूरा करने का का सम्बल प्रदान करती है।हाइकु स्त्री अंतर्मन और उसकी क्रियाविधि को बख़ूबी रचता है।स्टेला जी बधाई!
-मीनू खरे


इस हाइकु में यह बता या गया है कि मां अपने बच्चों  के जीवन और सुसंस्कृत बनाने हेतु अथक श्रम करती है और अपना सुख भी इसी में देखती है। मां की ममता का सुंदर दृश्य। अर्थपूर्ण हाइकु। बधाई ।
अन्य हाइकु पर बाद में लिखूंगी। अभी ऑनलाइन कवि सम्मेलन में हूं।
-डॉ रमा द्विवेदी


इस हृदयस्पर्शी हाइकु में यह प्रतीत होता है कि बच्चे के जीवन को अच्छा बनाने के लिए माँ अपने को खुशी से श्रम की भट्टी में झोंक देती है। चाहे मेहनत मजदूरी की बात हो या अन्य कुछ... बच्चे के लिए स्वप्न देखना और साकार करना ही जीवन का ध्येय बन जाता है।
-पुष्पा सिंघी


 अँगीठी पर केवल खाना नहीं पकता ,एक माँ के सपने भी धीमे धीमे पकते हैं या कहें कि माँ खुद को पका देती है यानि पूरा जीवन बच्चों के लिए क़ुर्बान कर देती है .माँ की महानता को उद्घाटित करता सार्थक हाइकु.
-रीमा दीवान चड्ढा


‌‌उक्त तीन पंक्तियों में "मां" के सम्पूर्ण जीवन की तपस्या को साकार कर दिया है अंगीठी पूरे परिवार का वह रुप है जो अंगारों के समान है और इसी अंगीठी रुपी परिवार की अग्नि में मां अपना सर्वस्व जीवन अर्पण कर परिवार को परवरिस देकर तृप्त करती अपने सपनों को साकार करने के लिए, एक भावी आशा के साथ
-रति चौबे 


माँ की तपस्या लक्षित हो रही है।वह अपने आँचल का सारा पुण्य प्रताप बच्चों का जीवन सुखमय बनाने के लिए न्योछावर कर देती है। उत्तम अभिव्यक्ति
-कमलेश चौरसिया


घर में कुछ नहीं होगा तो वो इतना कर देगी कि खाली पर बच्चों को कभी सोने नहीं देती। डॉक्टर स्टेला जी का ये हाइकु मजबूर मां की काबलियत को दर्शाता हुआ कि किस प्रकार मां सीमित संसाधनों में अपने घर का भरण पोषण कर रही है। ओर इसमें घर को चलाते हुए वो किसी को इसका आभास तक नहीं होने दे रही है। मां की पूर्ण कला को प्रदर्शित करता हुआ ये हाइकु। अत्यंत सुंदर गरीब परिवार से संबंधित मार्मिक हाइकु। बधाई डॉक्टर साहब।
-चन्द्रभान मैनवाल


माँ की स्थिति,संवेदना,प्रेम और पीड़ा को व्यक्त करता मार्मिक हाइकु माँ सचमुच खाना पकाने के बीच पता नहीं कितना कुछ अपने मन में पकाती है या उन समस्याओं से खुद पक जाती है जिन्हें किसी से नहीं कह पाती। वह या तो किसी पीड़ा के साथ होती है या भविष्य का कोई सपना देख रही होती है। प्रत्यक्ष रूप से जब वो खाना पकाती है। सुन्दर अति सुंदर चित्र उकेरता हाइकु।
-सोनम यादव 


 माँ के अन्तर्मन के पीड़ा को प्रतिबिम्बित करता भावभरित व सटीक तथा मार्मिक हाइकु।
-सूर्यनारायण गुप्त सूर्य


स्त्री जीवन का सार ‘माँ’ है। अपने बच्चों के लिए माँ स्वयं का जीवन झोंक देती है। अपने बच्चों की मुस्कान एवं भविष्य के लिए वह अपने ख़्वाबों, अभिलाषाओं को जीवन की आँच पर तपा कर सारे कष्ट सहन करती है। माँ की महानता को प्रस्तुत करता सुंदर हाइकु। 
-पूर्वा शर्मा



नारी का जीवन का अधिकत्तर समय चूल्हा और चौके में ही भीतता है। वह अपने जीवन के बहुत से ख़्वाबों को रसोई ही में संजोती है और उसे वहीं जला भी देती है।                                                                                       -हेमा शंकर







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-तीन-
जाने कब से 
मौन साधे बैठे हैं
घने जंगल
-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर

  जंगल मे जब से जंगल का कानून समाप्त हुआ है और इंसानी दुनिया के कानून लागू हुए हैं तब से वहाँ खामोशी है, गुलामी की क्योंकि वहाँ अब शेर बचे नहीं , हिंसा लगभग बंद है । एक अजीब सी शांति है जैसे किसी अनहोनी से पहले की होती है । पेड़ , जीव - जंतु सब ख़ौफ़ में है इसलिए लिखना पड़ रहा है - जाने कब से ….। 
 -रमेश कुमार सोनी


जीवन दर्शन तो है ही। जंगल की वीरानी से व्यथित पीड़ा और जंगल के प्रति संवेदना, यह अद्भुत अनुभूति और अभिव्यक्ति है। ऐसा सृजन संवेदनशील मन की अनंत गहराई को भी मापता और दर्शाता है।
-नरेन्द्र श्रीवास्तव


जंगलों में रहते प्राणी कम होते जा रहें हैं । कब कौनसा वृक्ष कटेगा और जंगल का विनाश होगा, कोई भरोसा नहीं। यहीं बात इस हाइकु में बताई गई हैं।
-तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे


वृद्धावस्था की ओर इंगित करता यह हाइकु उत्कृष्ट है। संभवतः बुजुर्गों के अनुभवों को घना जंगल कहा गया है जिसकी वर्तमान पीढ़ी में किसी को आवश्यकता नहीं है अतः वे अपने आप में सिमटे हुए मौन बैठे हैं।
 -सुधा राठौर


नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी में वैचारिक मतभेद को दर्शा रहा है।घने जंगल यानी बुजुर्ग समयानुसार समझौता कर खामोश हो जाते है ।
-नीलम अजित शुक्ला


मानव ने प्रतिस्पर्धा के कारण जंगलों को नष्ट कर दिया और वन्य प्राणियों से उनका जीवन व घरौंदा भी छीन लिया।मानव को सब कुछ पेड़-पौधों से ही प्राप्त होता है। जंगल साधु संतों की तरह सदियों से कष्टों को झेलते हुए मौन धारण किए हुए हैं। भावपूर्ण व संदेशात्मक हाईकु है।
-सविता बरई वीणा


यह हाइकु मुझे विकास और शहरीकरण के लिए अंधाधुंध कटते जंगल की ओर इशारा करता प्रतीत होता है । तीसरी पंक्ति पढ़ने के बाद पहली दो पंक्ति सवाल पैदा करती है की जंगल मौन क्यों है ?और जंगल मुखर कैसे था? जंगल की मुखरता थी उसमें रहने वाले जीव जंतुओं से ।जंगलो को साफ कर वहाँ उद्योग और शहर बसाने के कारण जिनका अस्तित्व संकट में पड़ गया है जंगल की मुखरता थी उसके इर्द गिर्द रहने वाले आदिवासियों से जिनका जीवन जंगल पर भी निर्भर ज्यादा था। और जंगलो का सफाया होने से उनकी काफी क्षति हुई है। संभवतः इसलिए अब ये जंगल मौन प्रतीत होते है।
-सुनीता अग्रवाल नेह


बहुत सुंदर हाइकु। इंसानों द्वारा अपने स्वार्थ हेतु पेड़ों को काट-काटकर पूरे जंगल खाली कर दिए जाने के  दर्द की बेहद मार्मिक अभिव्यक्ति। इस हाइकु का एक और अर्थ भी खुलता नज़र आ रहा है कि कैसे आज के दौर में बच्चों की मनमानियां सहते हुए ..बुजुर्ग चुप रह जाने को मजबूर हैं।
-आभा खरे


अत्यन्त गहन अर्थों वाला यह हाइकु समाधि की ओर ले जाता प्रतीत होता है। घना जंगल जिसमें जाने कितने जीवनों का कोलाहल समाहित है। बस उसी कोलाहल में डूब उसे निरखने,परखने में लीन... वाह्य दुनिया से विरक्त,गहन-गम्भीर,शान्त, निर्विकार, ऋषियों जैसा  स्वरूप घने जंगलों का ! ग़ज़ब का रचनाशिल्प! प्रणम्य कहन ! बधाई स्टेला जी !
-मीनू खरे


कटते जंगलों की व्यथा प्रतीत होती है। प्रश्न.उठता है कि जंगल मौन क्यों है ? मानव द्वारा प्रकृति से छेड़-छाड़ के कारण उनका अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है। आज घने है, कल उनकी बारी भी आ जायेगी। उनके मौन में भी करुण रूदन छिपा हुआ प्रतीत होता है। विनाश के कगार पर खड़ा मानव सुन नहीं पा रहा है।
-पुष्पा सिंघी


घने जंगलों में चुप्पी का अर्थ है किसी अनिष्ट की आशंका ,घर के बुजुर्ग भी यदि एकदम चुप रहते हैं तो इसका अर्थ है कि उनकी सलाह को कोई मानने वाला नहीं है आज के दौर पर भी इसे ले सकते हैं कि ऐसे समय में समझदार लोग चुप हैं।
-रीमा दीवान चड्ढा


जंगलों की पीड़ा और कुछ न कह पाने की असमर्थता दर्शाता ... सुन्दर हाइकु
-उमेश मौर्य



जंगल अपनी विनाश लीला देख कर मौन है।यह मौन आने वाली विपत्ति का संकेत दे रही है।
-कमलेश चौरसिया



सुंदर कल्पना है। शाब्दिक अर्थ के अतिरिक्त यदि देखा जाएं तो ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे बुजुर्गों का जीवन जो खुशियों से हराभरा था आज उनके जीवन की वे खुशियां मुरझा गई हैं। उन से कोई बात नहीं करता, उनकी कोई नहीं सुनता इसलिए वे मौन हो कर बैठे हैं इस आशा में कि कोई तो उनसे बात करेगा। अत्यंत मार्मिक हाइकु। बधाई।
-डॉ रमा द्विवेदी


कटते हुए जंगल अपनी धरोहर को नष्ट होते हुए देख कर मौन है और चिंतित है कि आने वाली उनकी पीढ़ियों का क्या होगा और आश्चर्यचकित है कि यह मनुष्य अपनी ही प्राण वायु को किस प्रकार से नासमझी में नष्ट किए जा रहा है। बहुत खूब
-एन. के. शर्मा


डॉ स्टेला जी का यह हाईकु क्यों खड़ा हुआ यह द्वितीय पँक्ति से पता चलता है। यहां जंगल की विशेषता बताई गई है कि वो घना है। अतः उसमे पेड़, पौधे, वनस्पति लतायें आदि तथा जीव- जन्तुओं का प्रचुर मात्रा में होना स्वभाविक है। ऐसा जंगल मौन साधना किये हुए गतिमान नही है। कितने समय से ? यह भी ज्ञात नही है।
प्रकृति सदैव परिवर्तित होती रहती है। जैसे कि हवा यदि किसी समय शांत है तो अगले पल शोर भी मचा सकती है , सूर्य व चन्द्रमा सदैव गतिशील ही दिखते हैं। ऐसी परिस्तिथि में घना जंगल शांत है यह उसके द्वारा मौन साधने के कारण हुआ।मौन साधना एक कठिनतम साधना होती है जो कि असाधरण साधक द्वारा ही साधी जा सकती है। मौन प्राकृतिक विशेषताओं युक्त होते हुए विपरीत स्तिथि को प्राप्त करना भी कहा जा सकता है।घने जंगल की विशेषता यह होती है कि निरन्तर ही पे, पौधों ,जीव- जंतुओं की उपस्तिथि उनके द्वारा उत्पन्न ध्वनियों से ज्ञात होती रहती है। ऐसी प्रकृति वाला यदि मौन साध लेता है तो किसी गहरी वजह के कारण विरोध स्वरूप ही होता है। उस बिम्ब को अब ऊपर उल्लेखित व्याख्या द्वारा आसानी से देखा जा सकता है। एक बहुत ही बढ़िया कोशिश पाठक को हाइकु के माध्यम से बहुत ही गहरी बात को बताने की। नमन।
-रामकुमार माथुर


आदरणीय कमलेश भट्ट कमलजी की एक ग़ज़ल का अंश है कि-
  विरोध करने का अपना तरीका पेड़ का भी है ।
जहां से डालियां काटी वहां पर कोंपले निकली ।।
     तात्पर्य है कि वन सम्पदा, जल सम्पदा, खनिज सम्पदा जितनी भी अमूल्य धरोहर प्रकृति ने हमको बख़्शी हैं उन सभी का अंधाधुंद दोहन मानव द्वारा अपने स्वार्थ के लिए किया जा रहा है। क्या करें प्रकृति बोल तो सकती नहीं,परंतु समय समय पर मानव को अपनी उपस्थिति कराती रहती है। नतीजा आपके सामने है। बेहद उत्तम हाइकु प्रकृति की पीड़ा को बयां करता हुआ। बहुत बहुत बधाई डॉक्टर साहब।
-चन्द्रभान मैनवाल


मेरे विचारसे यह हाइकु प्राकृतिक और भौतिक दोनों ही केंद्र बिन्दु पर आधारित है ,एक एक कर जंगल कटते जा रहे हैं चारों ओर सन्नाटा ही सन्नाटा छा ने लगा है आसपास के वन कटने से एक अकेला घना वन जहाँ से पशु पक्षी भी पलायन करने की स्थिति  में हैं उनके आवासों पर आने वाले खतरों और स्थिति की गम्भीरता से प्रभावित जंगल  पूर्ण  रूप से स्तब्ध शान्त साधक से बैठे हैं दूसरी ओर भौतिक जगत में एक भरे पूरे परिवार के मुखिया को जब सम्मान नहीं मिलता आज की युवा पीढ़ी उनके बेटा बेटी उनकी बातों को उनके अनुभवों को सुनते ही नहीं तो मौनम् स्वीकृति लक्षणं को अपने जीवन का अंग बना मात्र घटित को ही शांत हो देखते रह जाते हैं जंगल और जन दोनों में जीवन है, एक जड़ तो दूसरा चेतन, दोनों ही परिवेश और परिवर्तन से प्रभावित होतेहैं। यह हाइकु एक डिब्बी के समान है जो कई रंगों से भरी है ।
-पुष्पा मेहरा


यह बहुत ही सुंदर गहन अर्थ देता हाइकु है। इस हाइकु के कई अर्थ निकलते हैं।  एक अर्थ- जो ज्यादा ज्ञानी होता है वह मौन रहता है। जंगल के पास घनी संपदा है इसलिए वह मौन है। एक और अर्थ- अपने आसपास अन्याय को देखकर भी जानबूझ कर कुछ लोग मौन बैठे हैं या वे चुप रहने के लिए मजबूर है। एक अन्य अर्थ- मनुष्य अपनी मनमानी करता जा रहा है इसलिए जंगल अपना रोष या विरोध प्रस्तुत करने के लिए मौन है।
-पूर्वा शर्मा



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-चार-
तुम्हारा छाता
खूँटी पर टँगा है
चूहों का घर
-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर

वर्षा के बाद से खूँटी पर अनुपयोगी छाता टँगा है बदस्तूर कि इस पर अब चूहों ने अपना घर बसा लिया है क्योंकि शहरी अपार्टमेंट्स में चूहे बिल नहीं बना पाते बस ऐसे ही सामानों के बीच आशियाना ढूँढते हैं।
-रमेश कुमार सोनी


वाहः बेहतरीन हाइकु। इस हाइकु को कदाचित इस भाव से रचा गया हैं नारी के पति उससे दूर है और उनका छाता उनकी रह रह कर याद दिलाता है और छाते में अब चूहों ने अपना घर बना लिया है
-अभिषेक जैन


गरीबी के गहन संघर्ष से जूझते जीवन का मार्मिक चित्रण। दया और सहानुभूति से द्रवित ।
-नरेन्द्र श्रीवास्तव


उत्तम हाइकु ।हाइकु में जहाँ ‘फ़्लैट-कल्चर’की मजबूरी का भाव है,वहीं पत्नी अपने पति को मानो कह रही हो कि आप अपनी चीजों को सहेजते नहीं है कि छाता टंगे-टंगे चूहों का घर बन गया है ।
 -आर बी अग्रवाल


यह मार्मिक हाइकु किसी प्रिय के चिर वियोग को प्रकट कर रहा है । उसके जाने के बाद उसकी वस्तुएँ निष्प्रयोज्य होकर रह गयीं हैं ।उदाहरण के लिए छाता ,जिसका लंबे समय से प्रयोग न होने के कारण चूहे उसे कुतरने लगे हैं ।
-सुरंगमा यादव


ये हाइकु बहुआयामी लगता है, सोचने को मजबूर कर रहा है, 1) पिया बाहर है व फिर सावन आगया पिया नही आये। 2) क्योंकि छाता वर्षा को ही इंगित कर रहा है व गांव में वर्षा ही नही हो रही व छाता काम न आने से चूहों का घर बना हुआ है सोचने को मजबूर करता हाइकु
-कैलाश कल्ला


एकाकीपन झेल रही/रहा की मनोव्यथा की ओर इंगित करता यह हाइकु मर्मस्पर्शी है। छाता मानों एक देह है जो एक ही जगह बहुत समय से ठिठकी हुई है। जिस तरह ठहरे हुए जल में जलकुंभी का वास होता है या की दिनों से देखभाल न होने पर वस्तुओं में कीट/जंतुओं का बसेरा बन जाता है उसी तरह विरहग्रस्त की व्यथा पर किसी का ध्यान न हो तो वह भी अनेक रोगों से ग्रस्त हो जाता है।
-सुधा राठौर


यह हाइकु वियोग की पीड़ा को दर्शाता है।पति बहुत दिनों से बाहर है,पत्नी उनका सामान देखकर,उदास हो रही है।
-नीलम अजित शुक्ला



महिला की स्थिति अत्यंत दयनीय है,उसका पति कई वर्षों से छोड़कर चला गया है उसको अपने पति से बहुत स्नेह है वह अपने पति से वर्षों दूर रहने के बाद भी पति की सभी वस्तुओं को संभाल कर रखती है।खूँटी पर टंगा छाता बहुत पुराना हो गया है उसमें चूहों ने घर बना लिया है, लेकिन वह पुरानी यादों में जीवन व्यतीत कर रही है। बहुत ही भावपूर्ण ह्रदयस्पर्शी हाईकु है।
-सविता बरई वीणा


उत्तम हाइकु है। "तुम्हारा छाता" ये पहली पंक्ति एक आधार बनाती हुई दूसरी पंक्ति पर खत्म होती है जो ये भाव प्रकट करता है किसी प्रिय का छाता खूँटी पर टंगा है या तो वो कहीं और हैं या अब इस दुनिया मे नही है और उनका छाता अब काम मे नही लिया जा रहा जो अर्थ खुलता है तीसरी पंक्ति में जिसमे पता चलता है कि प्रयोग में न आने के कारण उसमे चूहों ने अपना घर बना लिया है। इसमें एक विरह भाव दृष्टिगोचर हो रहा है। इस सुंदर हाइकु के लिए लेखिका को बहुत बहुत बधाई।
-सुनीता अग्रवाल नेह


 यह हाइकु वियोग की पीड़ा को दर्शाता है। कोई अपना बहुत दिनों से साथ नहीं हो और उसके लौट आने के इंतज़ार में नज़रे उसकी इस्तेनाल की वस्तुओं पर ही बार-बार जा ठहरती है। और छाते में चूहों के घर बना लिए जाने का बिम्ब बहुत सुंदरता से कह गया कि  वो अपना काफी समय से वापस नहीं आया है।
-आभा खरे


यह हाइकु विशिष्ट है क्योंकि यह चित्र उपस्थित करने के साथ ही व्यापक परिवेश की स्पष्ट विशेषताओं के  सौंदर्य को भी दर्शाता दीखता है।अल्हड़,अलमस्त,बेतरतीब, बेपरवाह किन्तु जीवन्त जीवनशैली को रोचकता से रूपायित करता यह हाइकु परिवेश में पाठक की उत्सुकता जागृत करता है। दृश्य निश्चित रूप से पुराने घर का है जहाँ चूहे के बिल आदि का होना कोई असामान्य बात नहीं है पर इतने लम्बे समय से छाते का टंगा होना कि चूहे उसे अपना घर बना लें, यह ज़रूर मनोरंजक है।चूहे का घर टंगा होना विस्मयकारी बिम्ब प्रस्तुत करता है।बहुत बधाई स्टेला जी इस हाइकु हेतु !
-मीनू खरे


इस हाइकु में यह भाव प्रकट होता है कि किसी प्रिय का छाता खूँटी पर टंगा है जो यहाँ से कहीं बहुत दूर जा चुके हैं पर उनका छाता आज भी वहीं टंगा है । यह उनके प्रति अगाध स्नेह का प्रतीक है कि इस निशानी को दूर करना मुश्किल है। प्रयोग में न आने से वस्तु की उपयोगिता को समय के चूहों ने कुतर दिया पर प्रेम-वियोग की पराकाष्ठा का प्रतीक छाता फिर भी टंगा हुआ है हृदय में और खूँटी में भी।
-पुष्पा सिंघी


तुम पास नहीं हो पर तुम्हारी याद छाते के रूप में टंगी है खूंटे पर ,चूहों ने उस पर घर बना लिया है पर फिर भी वो संजोया गया है क्योंकि प्रियजन का है छाते का महत्व व्यक्ति की वजह से है .प्रियजन की वस्तु हर हाल में प्रिय होती है भावपूर्ण हाइकु
-रीमा दीवान चड्ढा


विरह वेदना से व्यथित व्यक्ति के मस्तिष्क में चूहे रूपी दुर्भावना उठने लगती है। जो व्यथा का कारण बन जाती है। बहुत सुन्दर बिम्ब।
-कमलेश चौरसिया


यह हाइकु प्रिय के विरह की पीड़ा को दर्शा रहा है। तभी तो छाता को खूंटी से हटाया नहीं गया और जो वस्तु इस्तेमाल न हो वह चूहों का घर बन जाती है। सुंदर कल्पना। बधाई डा. स्टेला जी।
-डॉ रमा द्विवेदी


डॉ स्टेला जी का यह हाइकु  वक्त की खूंटी पर टँगी वह छतरी जो कि विपरीत परिस्तिथियों में काम आती है अब मजबूरी, लाचारी तथा बाधित प्रगति को इंगित कर रही है। यह हाइकु बहुत ही अच्छी तरह बिम्ब को प्रतिबिंबित करता है। हाइकु लेखन पर डॉ स्टेला जी को कोटिशः नमन।
-रामकुमार माथुर



मां को समर्पित बहुत ही प्रभावकारी हाइकु। विंब, लय, ध्वनि और वैचारिक बोध से संपृक्ति।
-लक्ष्मीकान्त मुकुल


यह हाइकु अपने प्रिय की प्रतीक्षा को दर्शाता करता है। वह छाता वैसा ही  टँगा है जैसे कि उसे प्रिय ने छोड़ा था। लंबे समय से प्रिय के न आने के कारण चूहों ने उसमें घर बना लिया है। उसकी याद में आँखें आज भी उसके आने की आस लिए उस छाते को निहार रही है। विरह का सुंदर चित्रण प्रस्तुत करता हाइकु।
-पूर्वा शर्मा




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-पाँच-
बेटी ने झेली
कोख से कब्र तक
अनन्त पीड़ा
-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर

बेटियों के  दर्द की यात्रा कोख से कब्र तक होती है , सुंदर भाव - बधाई । कोख में भ्रूण हत्या का डर , जन्मी तो भेदभाव , हिंसा , एसिड अटैक , और बलात्कार का डर ,ब्याही तो ससुराल का डर , घरेलू हिंसा का डर , तलाक का डर और विधवा होने , वृद्धाश्रम …. तक डर की अनंत यात्रा का खूबसूरती से वर्णन ।

  -रमेश कुमार सोनी


नारी के जन्म से लेकर मरण तक की पीड़ा को बयां करता सटीक हाइकु
आदरणीय  डॉ. सुरजमणि स्टेला कुजूर जी को उपरोक्त सभी बेहतरीन,सारगर्भित हाइकु के सृजन हेतु अनंत बधाई एवं शुभकामनाएं
-अभिषेक जैन


अमूर्त सच की वास्तविकता शब्दों मे खूबसूरत तरीके से पिरोई गई है.. स्त्री की जीवन यात्रा और उसके पड़ावों मे आने वाली पीड़ा का भाव उभर कर आ रहा है.. कोख से कब्र का सफर शब्दों मे हाइकु के नियमों के अनुसार संयोजित करना उत्तम है..
-मनीष मिश्रा मणि


वैसे तो भारतीय समाज में नारी को लक्ष्मी का दर्जा दिया गया है, और किताबों में भी लिखा है कि यत्र नारी पूज्यंते रमंते तत्र देवता।मगर नारी की जिंदगी की हकीकत कुछ और ही बयां करती है। पुरुष प्रधान समाज में नारी के दुख स्कूल के समय से ही शुरू हो जाते हैं।या यूं कहिए कि नारी को पुरुषों की तरह खुला आसमान नहीं मिलता ।यदि कहीं किसी घर में खुल कर जीने की सुविधा मिल भी गई तो समाज तरह तरह की टिप्पणियां करता है। जवान हुई तो शादी ओर फिर ससुराल।
आए दिन पेपर में पढ़ने को मिल जाता है कि दहेज देने को पिता कर्जदार हो गया और शादी के एक वर्ष के अंतराल में ही दुल्हन को जला कर मार दिया गया ।
यानी नारी का जीवन संघर्ष मय अक्षर देखा गया है एक दो अपवाद को छोड़कर नारी को आगे बढ़ने के लिए खुद आगे आना पड़ा है । नारी के जीवन को रेखांकित करता डॉक्टर सूरज मनीजी का बेहतरीन हाइकु  है।
-चन्दभान मैनवाल


स्त्री जाति के जीवन संघर्ष की शाश्वत व्यथा- कथा।
आदरणीय डॉ.सूरजमणि जी के हाइकु सशक्त और सार्थक हैं।
लेखनी और सृजन को शत शत नमन।
-नरेन्द्र श्रीवास्तव


यह हाइकु ही सही नही है। किसी स्थिति विशेष का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता है। हर बेटी पर सही नहीं उतरता। क्या वे इस पीड़ा से गुजर रही हैं ? नहीं न ! तो फिर क्या यह हाइकु अर्थहीन नहीं हो गया ? फिर कोख जैसा पवित्र स्थान जहाँ पर दुख तो है ही नही व कब्र जैसी शांति वाली जगह जहां भी कोई दुख ,सुख आदि नही है को ऐसे जोड़ना गलत है।
-रामकुमार माथुर


हाइकू में वर्तमान समय की वास्तविकता को बड़े ही मार्मिक रूप से वर्णन किया गया है. एक बेटी यदि बाहरी दुनिया के शब्दो को कोख में सुन पाती की उसके जन्म से पहले ही कोई भी उसके जन्म लेने की कामना नहीं रखता है सभी की चाहत है कि एक बेटे का जन्म हो.. तो यह जानकर कौन बेटी अपार दुःख महसूस  नहीं करेगी .और जन्म के बाद बेटी किन परिस्थितयों में जीती है इसका ज्ञान शायद हम सब रखते है....मेरे व्यक्तिगत दृष्टिकोण में यह एक उत्तम हाइकु है..
-एन के शर्मा


यह हाइकु नारी जीवन की शाश्वत पीड़ा का चित्रण कर रहा है, जो पहले जन्म के बाद प्रारंभ होती थी आज गर्भ से ही शुरू हो जाती है तथा जीवन पर्यंत चलती है।
-सुरंगमा यादव


यह अपने आप में समर्थ हैं। नारी के बेबस जीवन का चित्रण ज्यों हर घड़ी हर पल समाज में दिखाई देता हैं।
डा० सूरजमणि जी के हाइकु समाज के व्यंग को प्रतीकों के माध्यम से सीधे व्यक्त होते हैं, पाठक को झकझोर कर रखते हैं।
-तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे


मां की कोख से आगाज़ जिस बेटी का होता उसका अंजाम धरती मां की कोख में जाकर होता एक स्त्री विमर्श के साथ चलते शब्द
-अविनाश बागड़े


समाज में स्त्री की दशा/ व्यथा दर्शाते इस हाइकु में नारी के पूरे जीवन का दर्शन है। जब वह कोख़ में रही तो उसे नष्ट करने के नये- नये कष्टप्रद प्रयोग किये जाते रहे और यदि वह बच गई तो मृत्युपर्यंत उसे अनेक यातनाएं सहन करना पड़ीं।
-सुधा राठौर


निशब्द इस हाईकु की जितनी तारीफ करे उतना ही कम है एक बेटी की व्यथा है । जन्म से कब्र  बीच की जिंदगी  हर बेटी की अपनी कहानी होती है ।
-पूनम मिश्रा


उम्दा हाइकु। यह नारी जाति की विवशता को दर्शाता है। बेटी के रूप में, पत्नी के रूप में,जीवन के अंत तक नारी को जीवन मे कठिन से कठिन राहों से गुजरना पड़ता है ।
-नीलम अजित शुक्ला



बेटी का जन्म कष्टों से भरा होता है कई बार जन्म लेने से पहले ही उसकी हत्या कर दी जाती है। उससे भेदभाव किया जाता है। बेटी में बचपन से समर्पण की भावना रहती है वह मायके से लेकर ससुराल तक सबको ख़ुशियाँ  देने का प्रयास करती रहती  है। कई कारणों से परिवार की खुशियों के लिए अनंत दुखों को सहते-सहते उसकी असमय मृत्यु भी हो जाती है।
डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर जी के सभी हाइकु ह्रदयस्पर्शी, भावपूर्ण व उत्कृष्ट है आपको बहुत-बहुत बधाई व ढेरों शुभकामनाएं
-सविता बरई वीणा


मार्मिक सृजन।एक कटु सत्य है ये भी। लेखिका ने उस समाज का आईना सामने जिसमे आज भी बेटी को बोझ समझा जाता है  । हालांकि अब थोड़े दृश्य बदल गये हैं पर पूर्णतया नही आज भी बेटियों को बोझ समझ कर कोख में भी मार देने वाले हैं पर अब सरकार ने इसपर कठोर कानून बना दिये हैं तो इसकी संख्या नगण्य ही होगी । इसमें पितृसत्ता की प्रवृति भी झलकती है। जहां पहले पिता के फिर बाद में महिलाओं को पति के अधीन रहना होता है उनका अपना कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व नही रहता ।
आदरणीया स्टेला जी के ये सभी हाइकु समाज से जुड़े हुए  बेहतरीन हाइकु है ।
-सुनीता अग्रवाल नेह


बेहद हृदयस्पर्शी हाइकु। यह बेटे-बेटी में फर्क करने वाले समाज की विद्रूपता का उदाहरण है। जिस बेटी को कोख में ही मार दिए जाने की बात होती हो ...उसका जन्म के बाद का जीवन भी किसी मृत्यु सम जी बीतता है।
आदरणीय स्टेला जी के सभी हाइकु बहुत भावपूर्ण हैं। उन्होंने अपनी हाइकु कविताओं में समाज की विद्रूपताओं और विडंबनाओं  को भरपुर उठाया है। नमन आपको।
-आभा खरे


अत्यन्त मार्मिक हाइकु । नारी जीवन का पर्याय । कहने को बहुत बड़ी बातें कही जा रही है पर सत्य लगभग यही है । जहाँ कन्याभ्रूण हत्या की पीड़ा निहित है वहीं साथ में  दोयम दर्जे में जीवन बिताने की सचाई है । पिता-पति और पुत्र के कहेनुसार जीते-जीते स्वयं अस्तित्व विहीन होकर अंतत: जगजननी कब्र में या कहें चिता में चिर निद्राधीन हो जाती है ।
आदरणीया स्टेला जी के ये सभी हाइकु अत्यन्त उत्कृष्ट कोटि के हैं । बहुत-बहुत बधाई
-पुष्पा सिंघी 


स्त्री जीवन की त्रासदी का कटु चित्रण ,कोख से कब्र ...कोख में मारे जाने वाली बच्ची ,जीवन भर कष्ट सहती है.उसकी अनन्त पीड़ा को इस हाइकु ने सही चित्रित किया है .मार्मिक हाइकु
-रीमा दीवान चड्ढा

स्त्री की अनन्त पीड़ा को उकेरता हाइकु। बहुत सुन्दर। स्टेला जी को भावपूर्ण हायकु के लिए बहुत बधाई।
-कमलेश चौरसिया


सबसे अधिक मार्मिक हाइकु। स्त्री जीवन के संघर्ष  की अनंत पीड़ा इस हाइकु में समाहित हो गई है  । जन्म से लेकर मृत्यु तक स्त्री को संघर्ष करना पड़ता है । माना कि कुछ बदलाव आया है पर यह पूरी नारी जाति के लिए पर्याप्त नहीं है। बहुत सार्थक हाइकु ।
डॉ स्टेला जी के सभी हाइकु अपनी सार्थकता सिद्ध करते हैं । वे समर्थ रचनाकार हैं । बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं। सादर नमन।
-डॉ रमा द्विवेदी


जीवन के प्रत्येक चरण में एक स्त्री कभी बेटी तो कभी बहन, पत्नी, माँ आदि रूपों में अनेक कठिनाइयों का समाना करती है।  संस्कार एवं लाज की के नाम पर उसे  डाँट, दुत्कार, फटकार आदि को झेलना पड़ता है। यह आवश्यक नहीं है कि जीवन के प्रत्येक मोड़ पर उसे पीड़ा ही प्राप्त हो, लेकिन प्रायः यह  देखा गया है कि उसके जीवन में पीड़ाओं का अंत नहीं है। ऐतिहासिक / पूजनीय अवतार जैसे - राधा, मीरा, सीता, अहिल्या, द्रौपदी आदि के रूप में भी उसे पीड़ा तो झेलनी ही पड़ी। यहाँ तक कि कई बार तो उसे जन्म लेने का अवसर ही प्राप्त नहीं होता। इसलिए उसे जन्म लेने से लेकर मृत्यु तक जीवन में अनेक पीड़ा झेलनी पड़ती है। स्त्री जीवन की दर्द प्रस्तुत करता सुंदर हाइकु। सुंदर हाइकु सृजन के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ

-पूर्वा शर्मा





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डा० जगदीश ब्योम जी आप की वजह से आज सभी हाइकुकारों ने अपना बहुमूल्य समय,बेहतरीन,सार्थक,प्रेरक टिप्पणियँ देकर मेरी कल्पना औरभाषाई क्षमता को विस्तार दिया है।हर टिप्पणी,समीक्षा,आलोचना,सुझाव,राय ये सभी कवि के कलम को दिशा और दशा से अवगत कराता है।एक साहित्याकार के लिए यह बहुत जरूरी है।इससे कवि की कल्पना के उड़ान को विस्तार मिलता और भाषाई क्षमता को सुदृढ़ता।यही आप सब से मुझे मिला।यह मेरा अनमोल धरोहर बन गया।अगली किताब मेंआप सचित्र टिप्पणी के साथ मेरे साथ रहेंगे।और मैं शहर की गलियों,सड़कों,अलमारियों से निकालकर जंगल की ठंढी हवा में ले जाऊँगी।जहाँ आप की टिप्पणी को हजारों आशीर्वाद मिलेंगे।और वहाँ के लोग आप की टिप्पणी से प्रेरित हो कर अपनी भावनाओं ब्यक्त करने की कोशिश करेगें
    आप सभी हाइकुकारों को दिल धन्यबाद । समृध्द,पारखी,अनुभवी  हाइकुकारों का अंजुलि भर भर के  स्नेह मुझे मिला बहुत बहुत आभार।स्नेह बनाए रखें।
-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर

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ग्रुप में  विद्यमान सभी विद्वान/विदुषी  साहित्यानुरागियों ने आदरणीय डॉ स्टेला कुजूर मैडम के सुंदर , भावपूर्ण और हृदय स्पर्शी  हाइकु  रचनाओं की  सारगर्भित व्याख्या प्रस्तुत की है । मेरे लिए भी यह एक नयी और सुखद अनुभूति है ।
इन सभी हाइकु की यह विशेषता है कि ये  उन अर्थों में पूरी खरे उतरते हैं जैसा कभी मात्सुओ बाशो ने सोचा होगा ।
सभी हाइकु न केवल 5-7-5 के एक सामान्य से प्रचलित  नियम का पालन कर रहे हैं , बल्कि सभी में एक सरल अभिव्यक्ति, गूढ़ अन्तर्दृष्टि और पृथक एकांकीपन  साफ झलकता है। पहली दो पंक्तियां से पृथक तीसरी पंक्ति अनायास कुछ नया बयान कर जाती है जिससे पहली दो पंक्तियां भी नया अर्थ देने लगती हैं । यही संभवतः हाइकु की विशेषता भी है।
बहुत बहुत बधाई स्टेला मैडम !
आपने बहुत जल्दी साहित्य की इस नयी विधा को सफलता पूर्वक अंगीकार किया है।
-तनवीर आलम


दूसरे के हाइकु पर टिप्पणी लिखना केवल टिप्पणी लिखना नहीं है बल्कि हाइकु की भावभूमि से उसके परिवेश से हाइकुकार की उस समय की मनोदशा से स्वयं को जोड़ना है।
अन्य सदस्य भी टिप्पणी लिखें और खुलकर लिखें।
अपने हाइकु भी लिखते रहिए, सप्ताह में एक दिन सभी अपने अपने हाइकु पोस्ट कर सकेंगे।
हाइकु वही सदस्य पोस्ट कर सकेंगे जो दूसरों के हाइकु पर टिप्पणी लिख रहे हैं।
-डा जगदीश व्योम


डा स्टेला कुजूर मैडम के जितने अच्छे हाइकु हैं उतनी ही अच्छी अच्छी टिप्पणियां आप सभी ने की हैं।
स्टेला जी को इतने स्तरीय बेहतरीन हाइकु लिखने की प्रेरणा जिस झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्र के अनुभवों से मिली है, उनसे यह अपेक्षा रहेगी कि वायरस संकट से उबरने के बाद वे उन सभी हाइकुकारों को जिन्होंने टिप्पणी लिखीं हैं उन्हें उन मूक जंगलों से साक्षात्कार कराने के लिए एक हाइकु यात्रा कराएंगीं।
एक बार फिर से उनकी बेहतरीन हाइकु कविताओं के लिए आभार।
और सभी टिप्पणी लिखने वालों को धन्यवाद।
-डा जगदीश व्योम


सभी को प्रणाम। आप सभी अपना कीमती एवं विचार साझा करके न केवल अभिभूत किया बल्कि मन की खिड़की पूरी खोल दी। आप सभी की तन मन हृदय से दी टिप्पणियाँ मेरे चिन्तन की भावभूमि को प्रगाढ़ बनाने,मजबूती देने,निखारने में सहायक होंगी।आप सब बेहतरीन टिप्पणियाँ देकर जीवन के बहुआयामी स्वरूप के दर्शन करा दिए।जीवन के छंद,रस,बिम्ब,प्रतिबिम्ब सभी विषयों पर गहराई से बखूबी से आप सबने परोसा है।सभी ने न केवल जड़ पकड़ा बल्कि धड़, टहनी, तना,पत्ते,फूल,फैलाव,रस,गंध सभी अंगों,भावों को सटीक शब्दों में सार्थक समीक्षा करकेमुझे जीवन्त कर दिया। आप की टिप्पणियाँ छू रहे हैं अनतर्मन को,दर्द भी मुस्करा दिए।आप सभी को बारंबार वंदन और धन्यबाद। यों ही हम मिलते रहेंगे और एक दूसरे के हाइकु पर टिप्पणी,राय देकर एक दूसरे को समृध्द करते रहें इसी भाव के साथ पुनः धन्यबाद।
डा० जगदीश ब्योम जी हाइकु से परिचय आप ने कराके मुझ नाचीज को एक नया पथ दिया है।उम्मीद है आगे भी रोशनी मिलती रहेगी।हाइकु परिवार अपने विचारों से समाज की सेवा करती रही। धन्यबाद सर जी। पता नहीं मेरी लेखनी किस राह पर है।

अंधेरी राह
बढ़ रही कालिमा
सूझे न रास्ता


-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर








अंक - 35

अंक - 35

15 May - 2020
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हाइकु कविताएँ

गुंजन गर्ग अग्रवाल



                     
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आज हाइकु दर्पण समूह पर हाइकु चर्चा में थोड़ा सा बदलाव करते हैं वह यह कि आज पाँच (समूह पर सक्रिय) हाइकुकारों का एक एक हाइकु यहाँ पोस्ट किया जा रहा है। 
आप सभी से अनुरोध है कि आज पूरे दिन इन पाँचों हाइकुकारों की हाइकु कविताओं पर टिप्पणी लिखें और समूह में पोस्ट करें।
टिप्पणी स्वतंत्र रूप से खुलकर करें, भाषायी शालीनता का ध्यान रखें यह अपेक्षा रहेगी।
इन हाइकु कविताओं को आप अपनी सामर्थ्य के अनुसार कितना अर्थ विस्तार दे सकते हैं यह आप पर निर्भर है। 
यह न लिखें कि अमुक हाइकु ऐसा होना चाहिए बल्कि यह लिखें कि अमुक हाइकु की अर्थ व्यंजना कहाँ तक खुलती है..... हो सकता है कि आपकी टिप्पणी कोई नया अर्थ ही खोल दे।

-डा० जगदीश व्योम
15-05-2020
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- 01 -

बरखा बूँद 
खेतों में रचे छंद 
बाली में गूँथ
-गुंजन गर्ग अग्रवाल


- 02 --

सिसकती है
सफेद पत्थरों में
खामोश रात
-त्रिलोचना कौर


- 03 -

पलाश खिले
पूरा का पूरा गर्व
धूप का झरे
-तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे


- 04 --

डूबता गाँव
पोथी में पंडित जी
ढूँढ़ते हल
-उमेश मौर्य



- 05 --

पत्ता ही गिरा
तट को दें खबर
उठी लहरें
-कैलाश कल्ला



अंक - 34

हाइकु कविताएँ


अंक - 34
14 May - 2020
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आज समूह पर डा. रमा द्विवेदी का एक हाइकु प्रकाशित किया जा रहा है।
समूह पर सभी सदस्य अपनी टिप्पणी सीधे पोस्ट कर सकते हैं।


-डा जगदीश व्योम 
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                                                 - 01 -

मिट्टी के दिये
तैरते हैं गंगा में
प्रकाश भरे

-रमा द्विवेदी


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विभिन्न टिप्पणियाँ
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मेरे विचार से इस हाइकु का अभिप्राय है कि दीप आशा और विश्वास का प्रतीक है, माँ गंगा हमारी आस्था का।गंगा मैया हमारा कल्याण करें, यही कामना लिए दीप गंगा में प्रवाहित हो रहा है । आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो पितरों की विदाई में भी दीप प्रवाहित किये जाते हैं, तब दीप यह प्रकट करता है कि आत्मा अमर है और जीवन धारा भी गंगा की धारा की तरह अनन्त और शाश्वत है ।

-सुरंगमा यादव
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गंगा जी में प्रकाश भरे तैरते दियों में दिव्य,अलौकिक, मनमोहक दृश्य चित्रण का भाव परिलक्षित हो रहा हैं। अगर दूसरे भाव से परखे तो मिट्टी के दिये (मानव) तैरते गंगा में (जीवन के भवसागर में) यहाँ तक भाव स्पष्ट हैं लेकिन प्रकाश भरे यहाँ  इस भाव का संधि विच्छेद हो जाता हैं कि सभी मानव व्यक्तित्व प्रकाशमान नही होते। अतः पहला भाव ही दृष्टिगोचर हो रहा हैं।मनोहारी दृश्य का सुंदर हाइकु।   
-त्रिलोचना कौर
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मिट्टी का दिया यानी असहाय कमजोर .. कच्चा रहा तो खुद तैरना क्या.. दूसरे को सहायता नहीं पहुँचा सकता... लेकिन जल में बह रहा है.. प्रकाश फैला रहा है... कभी किसी को कमतर नहीं समझना चाहिए का सुंदर सन्देश देता हुआ.... तीन पँक्ति स्वतंत्र नहीं है अतः हाइकु होने पर संदेह पैदा कर रही है रचना

-विभा रानी श्रीवास्तव
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अमिधा शब्द शक्ति से सुसज्जित, दृश्य उपस्थित करता सुन्दर चित्रात्मक हाइकु !

-मीनू खरे
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आस्था और उम्मीद के शब्दों को प्रवाह देता मिट्टी से जुड़ा हुआ एक सहज सरल सार्थक हाइकु
रमा जी का
-अविनाश बागड़े
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यह भी हो सकता है कि
मिट्टी का दिया क्षणभंगुर मानव शरीर का प्रतीक है, प्रकाश आत्मा है और गंगा में प्रवाहित होना पवित्र संसार में दूसरों को ज्योति प्रदान करते हुए संचरण करने का सूचक है।
-डा जगदीश व्योम
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यहां 'मिट्टी के दिए' को यदि मृत शरीर से तुलनात्मक ‌द्ष्ठी से देखा जाए तो उपयुक्त रहेगा ,जिस प्रकार गंगा में मृत शरीर जो कभी प्रकाववान था वह दिए के समान ही बहता नजर आता है जब तक डूब नहीं जाता उसी प्रकार मिट्टी के दिए हेजब तक डूब नहीं जाते प्रकाशभरे रहते हैं ,,,

-रति चौबे
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मिट्टी के दिये .. दिये शब्द का सुन्दर प्रयोग . अपने छोटे होने के बावजूद अंधेरे मे स्वयं को प्रकाशित और अंधेरे से निरन्तर संघर्ष का प्रतीक,  तैरते गंगा मे धारा की परिवर्तनशीलता निरन्तर बहाव मे खुद को जलाए रखना... उस पूरे वातावरण को अपने प्रभाव से प्रकाश से भरना...
सुन्दर हाइकु ।

-उमेश मौर्य
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माटी के दीये सा साधरण दिखने वाला एक शिक्षक समाज की धारा में ज्ञान का पुंज लिए शिक्षा का प्रकाश फैला रहा है
-राजीव गोयल
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रमा जी का हाइकु बहुत गहरे आध्यात्मिक भाव को दर्शाता है।मिट्टी का शरीर,आत्मा के प्रकाश से प्रकाशित होकर गंगा में तैर रहा है।शरीर नश्वर है,लेकिन आत्मा अमर है और प्रकाशित है।बहुत अच्छे हाइकू के लिए रमा जी का बधाई।

-आशा पांडेय
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पंच-तत्वों में से एक तत्व (मिट्टी) का मिलन जब दूसरे तत्व (जल) से होता है तो उनके पावन मिलन से उत्पन्न प्रकाश से जग आलोकित हो उठता है।

-सुषमा अग्रवाल
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आध्यात्मिक आस्था को सहेजता यह हायकू अति सुंदर सहज व सरल और सत्यता को दर्शाता है रमाजी को बहुत  बहुत बधाई ।

-चन्द्रभान मैनवाल
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पंचतत्व को दर्शाता हुआ हाइकु।तेल रूपी श्वास के समाप्त हो जाने पर जोत आकाश में विलीन हो कर शरीर प्रकृति में मिल जायेगा।

-कमलेश चौरसिया
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मिट्ठी के दिए, कुछ दूर तैरकर गंगा  में डूब जाते हैं। जीवन की क्षणभंगुरता को ब्यक्त करते आशा ,विश्वास को जगाते । परिवर्तन शाश्वत है। और भारतीय संस्कृति का प्रतीक। 
-डा स्टेला
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वाहः बहुत सुंदर हाइकु है आदरणीया रमा जी का। इस हाइकु को मैंने इस नजरिए से देखा कि गंगा तट पर आरती के पश्चात रात्रि में मिट्टी के दीप समूह नश्वर शरीर को हँसते हँसते त्याग देते हैं।जीवन को जीने की कला व जीवन की क्षणभंगुता को दर्शाता सुंदर हाइकु

-अभिषेक जैन
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मुझे लगता है इस हाइकु में तीसरी पंक्ति "प्रकाश भरे" से ही इसके अर्थ खुलते हैं। पहली और दूसरी पंक्ति एक दॄश्य को प्रस्तुत कर रही है .. जिस से हम सब वाकिफ हैं। प्रकाश भरे पंक्ति उस  मनोकामना के पूर्ण होने का भी संकेत देती है ...जिस मनोकामना को करते हुए ये दीये गंगा में प्रवाहित किये गए हैं। 
बाकी आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाये तो मैं आदरणीय व्योम जी और त्रिलोचना जी के कथन से सहमत हूँ। 
आदरणीया रमा जी को बहुत बधाई।

-आभा खरे
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मिट्टी का दिया कुम्हार बनाता है।जिसकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती है,वह सारा जीवन दिया बनाकर भी निर्धन ही रहता है, परन्तु उसके बनाये हुए दीपों से जग रोशन होता है और जीवन से अंधकार दूर होता है एक छोटा सा दिया जीवन से अंधकार रूपी अज्ञान  को दूर करता है और ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। मनुष्य के अन्तिम सफर में भी वह साथ रहकर अन्तिम यात्रा को भी प्रकाशित कर देता है।
    रमा जी आपका हाईकु अनुपम, ज्ञानवर्धक है।आपको बहुत-बहुत बधाई व ढेरों शुभकामनाएं 
                      
-सविता बरई 'वीणा'
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 मिट्टी के दिये तेरते हैं गंगा में यह दृश्य सुंदर पवित्रता का भाव निर्माण करता हैं । स्वयं प्रकाशमान हैं । तिसरी पंक्ति में कुछ भी नयापन नहीं हैं ; यह अनुभूति तो पहले दोनों पंक्तियों में व्यक्त हुई हैं । अगर इस पंक्ति में मानवीय जीवन का नया पैलू उजागर होता, तो हाइकु में चार चाँद लगते ।
      
-तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे
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भारतीय संस्कृति की यही विशेषता है कि हमारे हर कर्म और परम्पराओंं में दर्शन, भक्ति, आध्यात्म और जीवन मूल्यों निहित होता है। 
  इसी परिप्रेक्ष्य में जल स्त्रोतों की पूजा, आरती, जलते दीप प्रवाहित करने की परम्परा भी है। यह जितनी भक्तिभाव को लिए है उतनी ही आत्मविभोर कर नैसर्गिक सुख और संतुष्टि भी समाये हुए है।
प्रस्तुत हाइकु सशक्त और संपूर्ण हाइकु है। जिस दृष्टि से देखो,वही आभास होगा। 
प्रत्यक्ष में जहाँ दृश्य अलौकिक और आत्मविभोर कर ऊर्जावान कर  देने वाला है, अप्रत्यक्ष मेंं प्रतीकों के माध्यम से संदेशवाहक बन प्रेरक भी है।
पानी केरा बुदबुदा... सदृश्य जीवन दर्शन भी है।
गागर में सागर ... की संपूर्णता का आध्यात्म भी है।
और मामूली सा लगने वाले दीप में प्रकाश की असीम सामर्थ्य है...
प्रेरक संदेश भी है। और भी बहुत कुछ... साहित्यिक दृष्टि से भी सुंदर, सटीक और सार्थक रचना
नमन लेखनी।

-नरेन्द्र श्रीवास्तव
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आदरणीया रमा जी का यह हाइकु एक सुंदर मोहक दृश्य उपस्थित कर रहा है।हाइकु पढ़ते ही सम्पूर्ण दृश्य आंखों के सामने उपस्थित हो जाता है । संभवत साँझ या रात्रि का समय है जब लेखिका ने इसे अनुभूति किया । "गंगा नदी  में तैरता माटी का दीया " जिधर जिधर से गुजरता है वो अंधेरे को चीरता हुआ जाता है। जिधर से गुजरे उधर प्रकाश देता है । जैसा कि आदरणीय व्योम जी ने कहा मुझे भी इसको पढ़ कर यही अनुभूति होती है माटी के दीये जैसा क्षणभंगुर जीवन है माटी के दीये को अर्थ तब तक नही मिलता जब तक उसमे रोशनी नही भरी जाये । हमारा ये शरीर ये जीवन भी इसी तरह का क्षणभंगुर है और इसकी सार्थकता तभी है जब हम अपनी आत्मा को प्रकाशवान करे । अपने कर्म और व्यवहार से अपना अपना जीवन भी आलोकित करें और औरो के भी काम आये औरों के लिए भी जियें । 
प्रकाश भरे स्वयं में फिर अन्य में । 
हालांकि मुझे भी संजय जी और तुकाराम जी के कथनानुसार इसमें थोड़े और सुधार की आवश्यकता महसूस हो रही है जिससे की इसका अर्थ और उभर कर आये 

-सुनीता अग्रवाल नेह
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मिट्टी के दिये को पता है, किसी भी समय गंगा की तेज लहरों में वह समा जाएगा,फिर भी वह प्रयत्नशील है अपनी रोशनी से जग के अंधकार को दूर करने जा प्रयास कर रहा है, कर्म का ज्ञान दे रहा है जीवन की सार्थकता को दर्शा रहा है, अंतिम क्षणों तक उम्मीद का दामन थाम हुये है।

-नीलम अजित शुक्ला
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बहुत सुंदर व सार्थक हाइकु ।इसमें जहाँ मिट्टी के दिए का महत्व रेखांकित किया है वहीं माँ गंगा की महिमा भी प्रकट हो रही है कि मिट्टी के दिए जैसी बस्तु को प्रकाशमान कर दिया ।
 बहन रमा द्विवेदी जी,जहाँ बधाई की पात्र हैं, वहीं माननीय व्योम जी को अत्यंत साधुवाद कि उनकी पारखी दृष्टि से इतना बढ़िया हाइकु वर्कशॉप के लिए चुना।
   
-आर बी अग्रवाल 
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रमा जी के इस हाईकु का भाव नि:संदेह गहन है, मैं भी इसे इस, रूप में देखती हूँ कि माटी का यह नश्वर तन संसार रूपी गंगा में बह रहा है.
प्रकाश आत्मा का प्रतीक... 
परंतु मैं विभा जी से सहमत हूँ कि पंक्तियां स्वतंत्र नहीं हैं.. 
एक सुझाव मात्र यह है कि इसे इस प्रकार कर लिया जा
प्रकाश भरे
गंगा में तैरते हैं
मिट्टी के दिये

-बुशरा तबस्सुम
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आदरणीया रमा द्विवेदी का सहज सरल शब्दों में लिखा गया हाइकु गहन विचार लिए हुए है । मूल भाव तो रचनाकार ही जानता है ,परंतु इस हाइकु पर लिखे गये लोगों के विचार, व्याख्या से हाइकु की श्रेष्ठता है । 
आध्यात्मिक एवं भारतीय दर्शन का बोध करता, आशावादी प्रकाशवान दृष्टिगत होता है । बधाई ..।

-शिव डोयले
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आदरणीया रमा द्विवेदी जी के इस हाइकु में सांध्यकालीन आरती व शंखनाद-मंत्रोच्चार का दृश्य स्वमेव ही जीवन्त हो उठा । पावन दिये सहज सौन्दर्य का आलोक बिखेरकर अद्भुत दृश्य उपस्थित कर रहे हैं । आध्यत्मिक अर्थ में गंगा में देह विसर्जन अन्तिम सत्य है और उससे पहले इस लघु जीवन को सार्थक कर जाने का संकेत है । बहुत-बहुत बधाई

-पुष्पा सिंघी
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कई बार ऐसा होता है कि हाइकुकार असमंजस में रह जाता है कि पहली पंक्ति ये होगी या तीसरी ये ।
मुझे इसी के कारण ऐसा हुआ  लगता है । कुल मिलाकर भाव , बिम्ब स्पष्ट है ।
कोई भी हाइकु पाठकों के मन में कई भाव भी लेकर आता है क्योंकि इसमें बहुत कुछ अनकहा रह जाता है ।
अक्सर हममें ऐसा होता है कि हाइकु की सूक्ष्मता के कारण कई माह या वर्ष पहले के दृश्य  स्मृति पटल पर से फिसल जाते हैं  ।
एक अच्छे हाइकु  के लिए  बधाई जिसमें दोनों भाव स्पष्ट हैं  लेकिन बुशरा जी की यह  बात गौर करने लायक मुझे  लगती है ।

-रमेश कुमार सोनी
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संस्कृति की एक सात्विक व सकारात्मक आस्था की सक्रिय ऊर्जा को संचारित करता एक समर्थ हाइकु!साधुवाद रमा जी!

-डॉ. मधु चतुर्वेदी
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कोई कवि जब कविता लिखता है या हाइकु लिखता है तो लिखते समय उसके सामने रचना के एक या दो अर्थ ही ध्यान में होते हैं। लेकिन जब रचना पाठकों के सामने आती है तो पाठक अपनी बुद्धि चातुर्य से उसमें तमाम अर्थ खोज लेते हैं।
रमा द्विवेदी ने यह हाइकु 2013 में लिखकर फेसबुक पर पोस्ट किया और भूल गईं, उन्हें याद भी नहीं रहा कि यह हाइकु उन्होंने लिखा है। यह उनकी दरियादिली ही है।
लेकिन मुझे उनके इस हाइकु में कुछ ऐसा लगा कि इसे समूह में चर्चा के लिए रखा जाए।
आप सबने अपने अपने स्तर से इसे जाँचा परखा और जो टिप्पणियां लिख कर पोस्ट की हैं उनको समग्रता की दृष्टि से देखा जाए तो यह किसी हाइकु की बहुआयामी समीक्षा उभर कर सामने आती है।
इन टिप्पणियों के बहाने हम सब सामूहिक रूप से हाइकु की समझ को स्वयं में भी विकसित कर रहे होते हैं और सामूहिक रूप से एक दूसरे से अनायास ही बहुत कुछ सीखते रहते हैं।
रमा  जी के इस हाइकु के बहाने आज पूरे दिन बहुत अच्छी और सार्थक चर्चा हुई।
सभी का आभार और रमा द्विवेदी जी का विशेष आभार अपने इस हाइकु पर चर्चा करने की अनुमति देने के लिए।
कल फिर किसी हाइकुकार के हाइकु को चर्चा के लिए रखेंगे।
पुनः एक बार फिर सभी का धन्यवाद।

-डा जगदीश व्योम
14-05-2020
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आदरणीय  रमा जी सुन्दर  हाइकु  और मिट्टी  के दिये की बात से आज जीवन मे रोशनी को आहट दी । बहुत सुन्दर  अभिव्यक्ति ।

-पूनम मिश्रा 'पूर्णिमा '
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सुंदर हाइकु रमा जी .... हार्दिक बधाई
इस हाइकु के अनेक अर्थ सामने आए । सभी रचनाकारों ने बहुत विस्तारित विश्लेषण कर टिप्पणी की, सभी को बहुत शुभकामनाएँ ।

-डॉ. पूर्वा शर्मा
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आप सभी सम्मानित मित्रो का अंतस की गहराइयों से आभार प्रेषित करती हूं । आदरणीय डॉ व्योम जी आपका आभार किस प्रकार व्यक्त करूं , मेरे पास शब्द ही नहीं है। आपके ही कारण मेरा अनमोल खोया हुआ  हाइकु ही नहीं मिला बल्कि आपने उस पर अत्यंत सार्थक परिचर्चा भी करवा दी। आज का दिन मेरे लिए चिरस्मरणीय रहेगा आदरणीय । आपने मुझे अनमोल उपहार दिया है , मन से आनंदित हूं आदरणीय डॉ व्योम जी। हाइकु पर कार्यशाला करवा कर हाइकु की श्रेष्ठता तक पहुंचने का यह बहुत उत्तम माध्यम है । यह निरंतर चलता रहे ताकि हम सब सक्रिय भी रहें और श्रेष्ठ हाइकु चयनित हो सकें ।  यह कार्य आप जैसे समर्पित पारखी एवं चिंतनशील विद्वान ही कर सकते हैं और हाइकु साहित्य को समृद्ध कर सकते हैं। हम सब इस कार्य में सहयोग करेंगे । आप  हमारा सदैव मार्गदर्शन करते रहें इन्हीं कामनाओं सहित सादर नमन आदरणीय

-डॉ रमा द्विवेदी
हैदराबाद
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Saturday, May 16, 2020

अंक - 33 आभा खरे

हाइकु कविताएँ


अंक - 33
13 May - 2020
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                                                 - 01 -


कूकी कोयल
मुँह ढाँप के सोये
गाड़ी के हॉर्न 

-आभा खरे



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विभिन्न टिप्पणियाँ
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आभा खरे जी का हाइकु कोरोना काल का सचित्र वर्णन करता हुआ उम्दा हाइकु ... बिना कोरोना का जिक्र किये.....
-विभारानी श्रीवास्तव
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आभा खरे जी का यह हाइकु बड़ा ही सशक्त हाइकु है। कितने सशक्त बिंब हैं कि अचरज होता है। ऐसे वातावरण में कोयल की कूक गूंज रही है जब सब कुछ बंद है। प्रकृति पर कोई पाबंदी नहीं। एक विस्तार लिए कथन अल्प शब्दों में। बहुत सुंदर
-बुशरा तबस्सुम
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कूकी कोयल
मुँह ढांप के सोये
गाड़ी के हॉर्न
-आभा खरे
वाह बेहद सुंदर हाइकु। भागती दौड़ती जिंदगी जब अचानक से थम गई है प्रकृति का रंग खुल कर सामने आ रहा है। इसी प्रकृति के एक क्षण का इस समय में लेखिका को साक्षात्कार हुआ है। लॉकडाउन के समय दैनिक जीवनचर्या में शामिल सारे शोरगुल थम गये हैं जिनके हम आदी हो चुके थे जो हमारे जीवन का एक हिस्सा बन चुके थे हम इतने अभ्यस्त हो चुके कि गाड़ी, कारखाने किसी भी चीज़ का शोर हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका हमे वो शोर ही नहीं लगता। इन सबके बीच प्रकृति ध्वनियों को पशु पक्षियों की मधुर चहचहाहट को हम भूल गए क्योंकि इन शोरों के बीच वो हम तक पहुँच ही नहीं पाते या भागमभाग वाली जीवन शैली में हमारा ध्यान नहीं जाता उन पर।ऐसे में लॉक डाउन की शांति के बीच या किसी अगले सुबह जब शहर में वाहनों के हार्न का शोर नहीं है तो अचानक कहीं ........
यह कठिन समय सिक्के का एक पहलू और हाइकु दर्शा रहा है सिक्के का दूसरा पहलू, सामयिक हाइकु

-राजीव गोयल
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भोर के सन्नाटे में कोयल कूक ही मधु आभास देती है। प्रत्येक शब्द  की विशेष पहचान है। सशक्त बिम्ब का हाइकु
सुन्दर अभिव्यक्ति।

-पूनम मिश्रा 'पूर्णिमा'
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आभा खरे जी का उम्दा, सशक्त हाइकु, जहाँ चारो ओर कोरोना महामारी के कारण सामाजिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा हुआ है, ऐसे  माहौल में कोयल की कूक दर्शा रही है प्रकृति की स्वतंत्रता।

-नीलम अजित शुक्ला
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प्रणाम विभा दी
इस हाइकु को पोस्ट करते हुए ..मैं डर रही थी कि अगर इसके बिम्ब खुलकर कोरोना समय या लॉक डाउन से न जुड़ पाये तो ये इस हाइकु का कोई औचित्य नहीं रह जायेगा। लेकिन दी आपकी टिप्पणी ने मुझे बहुत हौसला दिया और इस हाइकु को पूर्ण किया।  आभार विभा दी।

आभा खरे
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कूकी कोयल
मुँह ढाँप के सोए
गाड़ी के हॉर्न ....।
    -आभा खरे
यह हाइकु  कोयल के कूकने के दर्द को कोरोना की मृत्यु से उपजे दर्द के साथ  तुलनात्मक वर्णन है , इसमें एम्बुलेंस छिपा हुआ है लेकिन उसका हॉर्न यहाँ  प्रकट हुआ है ।
यदि इसके दर्द को और बढ़ाना हो तो अंतिम पंक्ति में ऐसा कर सकते हैं- दर्दीला हॉर्न ....।

-रमेश कुमार सोनी
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कूकी कोयल
मुँह ढांप के सोये
गाड़ी के हार्न
-आभा खरे

देशहित के लिए व स्वंय की सुरक्षा के लिए सभी देशवासी अपने-अपने घरों में थे। ऐसे में आवागमन के साधन भी पूर्ण रूप से बंद हो गये थे ।जिससे प्रकृति प्रदूषण भी कम हुआ है। चारों ओर सन्नाटा है लेकिन कोयल की कूक सुनाई पड़ रही है। आभा जी का हाइकु अद्वितीय है व सटीक बिंब प्रस्तुत कर रहा है। आभा जी आपको बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएं

-सविता बरई 'वीणा'
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कोयल की कूक बेबस  गरीब मजदूरों की पीड़ा,मुँह ढाप के सोये सरकार की निश्चंता,अकर्मण्यता,गाड़ी के हाॅन मृत्यु की बढ़ती भयावहता ,आज की सम्पूर्ण परिस्थतियों को समेटे हुए। समीक्षक तो नही हूँ। भावनाओं को पढ़ने की कोशिश एक पाठक की दृष्टि से।

-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर
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आभा खरे जी का हाइकु बहुत गहरे अर्थ और बिम्बों को समेटे हुए विस्तृत कैनवास  का हाइकु है।इन दिनों जब चहुओर कोरोना का कहर ढा रहा है इंसान इंसानों से दूरी बनाकर भयभीत हो घर में दुबका है ऐसे में प्रकृति फल फूल रही है।कोयल घूम घूम कर गा रही है(रहा है भी पढ़ सकते हैं) अर्थात प्रकृति स्वतंत्र है। हार्न के चुप हो जाने से शोर का प्रदूषण भी गायब है। बहुत अच्छा हाइकु।आभा जी को बधाई।

-आशा पांडेय
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बहुत सुन्दर,सटीक,सार्थक,सामयिकव लघु कलेवर मेँ विस्तृत अर्थ समेटे परिवेश को परिभाषित करता हाइकु!साधुवाद!!
     
-डॉ. मधु चतुर्वेदी
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प्रकृति के गीत को सुनना है तो हमें उसके साथ जुड़ना होगा।ऐसा ही संदेश देता यह हाइकू।जब हम भौतिकतावाद को त्याग कर अपने आप से जुड़ेंगे तभी हमें कोयल की कूक सुन पायेंगे।आज यह समय सार्थक है।बहुत उत्तम हाइकु।

-कमलेश चौरसिया
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कूकी कोयल
मुँह ढांप के सोये
गाड़ी के हॉर्न
-आभा खरे
बहुत अर्थपूर्ण हाइकु। लॉक डाउन के कारण सभी मनुष्य घरों में चुपचाप कैद हो गए हैं । वाहन नहीं चल रहे इसलिए हार्न का शोर भी समाप्त हो गया। वातावरण प्रदूषण मुक्त हो गया है। वाहनों के शोर एवं भागम भाग की ज़िन्दगी कोयल की या अन्य पक्षियों की आवाज भी सुनना हम भूल गए थे लेकिन अब जब मनुष्य एवं वाहनों का शोर थम कर वातावरण शांत हो गया है तब  कोयल की कूक अत्यंत मुखर होकर सुनाई दे रही है। सार्थक हाइकु के लिए आभा जी को बधाई।

-डॉ रमा द्विवेदी, हैदराबाद
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समयानुसार बदलती परिस्थितियां और बदलती परिस्थितियों में बदलते महत्व..... दानवीर प्रवृत्ति के कमजोर पड़ते ही माननीय स्वरों का उत्थान...... विपरीत परिस्थिति में भी जो प्राप्त हुआ उसकी अनुभूति..... जो चारों तरफ नक्कार खाना बन गया था, उसमें भी कोयल कूकी..... बिना किसी आपदा का नाम दिए या घटना का नाम दिए उसका वर्णन करना एक बहुत ही उत्तम अनुभूति, अभिव्यक्ति और उपलब्धि.

-विवेक कवीश्वर
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आभा खरे जी के हाइकु पर प्रतिक्रिया- ---मानव जितना भी भौतिक विकास कर ले परंतु एक मात्र प्रकृति ही शाश्वत सत्य हैं। बहुत सुंदर गहरे अर्थ को परिभाषित करता हाइकु।             

-त्रिलोचना कौर
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इतना कह सकता हू कि हाइकु के नियमानुसार कोयल के कूकने से ग्रीष्मकाल का एहसास होता है.. प्रकृति का समावेश..
साथ ही सम सामयिक गतिविधि में हॉर्न के बंद होने की स्थिति एवं कोयल की कूक का मधुर एहसास अनुभूति को समाहित कर रहा है.. वर्ण विन्यास 5,7,5 का निर्वाह स्पष्ट है..कविता कहने की हाइकु की शैली प्रभावी  है..

-मनीष मिश्रा मणि
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कोयल की कूक समस्त वसंत के वैभव को प्रकट करती है। प्रकृति की सुंदरता को देख आम की मँजरियों/ शाख पर बैठी कोयल की कूक वातावरण में मिठास घोलती है। आज वाहनों के हार्न या शोर आदि नहीं है शायद इसलिए  यह कूक हमें ज्यादा अच्छे से सुनाई दे रही है। लॉक डाउन के कारण वाहन गैरेज में बंद है और ढँके खड़े हैं। जब वाहन चल ही नहीं रहे तो उनके हार्न के बजने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए  कोयल की इस कूक से हार्न को कोई फर्क नहीं पड़ रहा । बंद, सुस्त-सोये वाहनों के हॉर्न भी मुँह ढँककर सोए पड़े हैं। कोरोनाग्रस्त जीवन में मानव की ज़िंदगी थम गई है। आज अधिकांश चीज़े बंद है लेकिन कोयल की कूक इस बात का प्रतीक है कि प्रकृति रुकी नहीं है वह अनवरत अपने सृजन में मग्न है।

-डॉ. पूर्वा शर्मा
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आदरणीया आपने अपने हायकु से सही सटीक अभिव्यक्ति की हैं करोना काल में हमें प्रकृति के निकट आने का अवसर मिला है। ध्वनि प्रदूषण से मुक्त होकर  पंछी भी सांस ले पा रहे हैं और हम उनके मधुर स्वर का आनंद अनुभव कर सक रहे हैं। सच में हायकु विद्या में कम शब्दों में गहरा अर्थ व्यक्त हो जाता हैं आपने सार्थक कर दिया । बहुत बहुत बधाई

-प्रेरणा माथुर
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 महामारी के इस संकट काल में चारों तरफ विनाश ही विनाश नज़र आ रहा है .दौड़ने-भागने वाली दुनिया थम गई है . कहीं कुछ अच्छा नज़र नहीं आ रहा है तब इतने बुरे दौर में कोयल की कूक कानों में मिठास घोल रही है.प्रकृति का सुरीला गायन तमाम परेशानियों, मुसीबतों के बावजूद सुखकर है .हार्न का मुंह ढांप कर सोना यह बताता है  कि कहीं न कहीं तेज़ रफ़्तार पर रोक लगी है और जहाँ हम रुके हैं ,थमे हैं प्रकृति को महसूस कर सके हैं . जीवन का शाश्वत सौंदर्य केवल प्रकृति के पास है यह सत्य केवल 17 अक्षरों में  उद्घाटित हुआ है .नि:संदेह एक शानदार हाइकु लिखा है आभा जी ने.
                 
-रीमा दीवान चड्ढा
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 वायरस से छिड़ी हुई जंग के वर्तमान माहौल में सब घरों में कैद हैं, डर फैला हुआ है, सब परेशान हैं दुःखी हैं। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है वह है सकारात्मक सोच का जिसमें  हम प्रकृति के निर्भर रूप को देख सकते हैं। इतना स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त वातावरण की किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। आभा खरे ने वर्तमान त्रासद काल में प्रकृति के इस रूप को देखने का प्रयास किया है। कोयल खुश होकर कूक रही है, सड़कों पर वाहनों के न चलने से परिवेश शुद्धता के चरम पर पहुंच गया है। क्योंकि गाड़ियां खड़ी हैं कवर ओढ़े जहां की तहां, कहीं उनके हार्न नहीं, कहीं शोर नहीं। सकारात्मक सोच के इस बेहतरीन हाइकु के लिए आभा खरे को हार्दिक बधाई।

-डा जगदीश व्योम
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वाहः कुछ ना कह कर बहुत कुछ कह गया ये हाइकु।आभा दी को इस बेहतरीन हाइकु के लिए बहुत बहुत बधाई सच कहूं तो मैं इस हाइकु को दूसरी दिशा दे रहा था लेकिन सफल नही हो पा रहा था जब विभा दी ने पहली प्रतिक्रिया दी तो सबकुछ साफ हो गया।
वाकई में कोरोना काल के असर को बेहद खुबसूरती से बयां करता सशक्त हाइकु

-अभिषेक जैन
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आदरणीया आभा खरे जी का हाइकु अर्थवान है, बिम्बों के माध्यम से सार्थक प्रस्तुति। जिसमें कोयल की कूक के मधुरता के मध्य आज मानवीय व्यथा को दर्शाया है। एक अच्छे हाइकु के लिए बहुत बहुत बधाई ।
                         
-शिव डोयले
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रोज की आपाधापी व कारो की चहलपहल व हॉर्न के प्रदूषण में हम प्रकृति का सौदर्य व कोयलों की कू कू सुन ही न पा रहे थे ।लॉकडाउन में जब ध्वनि प्रदूषण बंद हुआ तो आज हमें कोयल की कू कू भी अपनी और आकर्षित करती है व अलग आनंद देता है प्रकृति के करीब लेजाने वाला स्पष्ट बिम्बो वाला अति सुंदर हाइकु, बहुत बहुत बधाई

-कैलाश कल्ला
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यह धरा, गगन, जल, पवन यानी पूरा ईकोसिस्टम प्राणि जगत के सभी सदस्यों के निमित्त रचा गया है पर मानव की भैतिकतावादी प्रवृत्ति के चलते,अकेले ही सब कुछ हड़प लेने की होड़ के कारण, प्रकृति भयंकर असंतुलन का शिकार है।कई प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं शेष दयनीय अवस्था में हैं।लॉकडाउन ने मानव की अनियंत्रित चाल पर लगाम लगाई है और पर्यावरण प्राकृतिक साम्य की ओर बढ़ता दिख रहा है। आभा खरे द्वारा प्रस्तुत हाइकु इसी नव-साम्य की सत्रह अक्षरों की कहानी है।कान के पर्दे फाड़ने की हद तक पहुँचे ध्वनि प्रदूषण में या तो कोयल गाना ही  भूल गई या उसकी मधुर कूक नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़ जैसी दब गई।गाड़ियों के पहिए रूके तो शोर थमा  और कोयल की स्वरलहरियाँ फ़िज़ाओं में बिखर गईं!
”हॉर्न का मुँह ढाँप के सोना” नई कल्पना और बिम्ब प्रस्तुत करता है। हाइकु का शिल्प भी श्रेष्ठ है।व्यापक अर्थों में इस हाइकु को जीवन में भटकाव छोड़ सत्य की ओर चलने के आह्वान के रूप में भी देखा जा सकता है।
आभा जी को बधाई!

-मीनू खरे
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Tuesday, May 12, 2020

अंक - 32 आशा पांडेय

हाइकु कविताएँ


अंक - 32
May - 2020
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                                                 - 01 -


नर्स की बेटी
खोज रही है माँ को
कोने कोने में
             
-आशा पांडेय


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विभिन्न टिप्पणियाँ
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बेहतरीन हाइकु है आशा पांडेय जी का।
डाक्टर और नर्स आज के सबसे अग्रिम मोर्चे पर वायरस से जंग में जूझ रहे हैं। 
नर्स की नन्ही बेटी माँ को घर के कोने कोने में खोजती रहती है .....
समूची दृश्य उभर आया है डा आशा पांडेय जी के इस हाइकु में।

डा० जगदीश व्योम
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खतरनाक कोरोना महामारी से वर्तमान में सारा विश्व जूझ रहा है। इस संकट की घड़ी में हमारे देश के कर्मवीर देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों की परवाह न करते हुए कोरोना बीमारी से पीड़ितों की सेवा में लगे हुए हैं। हमारे देश के स्वास्थ्यकर्मी भी दिन-रात कुशलता से बीमारों की सेवा में लगे  हुए हैं। उनको अपने  परिवार से कई दिनों तक दूर रहना पड़ रहा है,ताकि इस बीमारी से परिवार पीड़ित न हो।
नर्स की नन्ही बेटी अपनी माँ को याद कर विचलित हो रही है,उसने बहुत दिनों से अपनी माँ को नहीं देखा है। इसलिए वह अपने इर्द-गिर्द माँ को तलाश कर  रही है।आशा जी आपका हाईकु ह्रदयस्पर्शी और वर्तमान हालात की जीवंत प्रस्तुति है। आपको बधाई व शुभकामनाएं 

-सविता बरई वीणा
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हाईकु की मुख्य विशेषता यह है कि यह समसामयिक परिस्थितियों को दर्शाता है, एक अच्छे लेखक की यही विशेषता होती है कि समाजिक गतिविधियों पर नज़र रखे और उसे अपने लेखन में विशेष स्थान दे.
इसके अतिरिक्त प्रस्तुत हाइकु का बिंब विधान बड़ा सुंदर है. जो दर्शाया गया है उससे इतर भी बहुत कुछ दिखता है, नर्स की बेटी माँ को खोज रही है दिख रहा है, हम यह भी देख पा रहे कि नर्स ड्यूटी पर है.
इसके अतिरिक्त हम सहज अंदाजा लगा सकते हैं कि बेटी बहुत छोटी है, समझदार होती तो माँ की व्यस्तता को समझती. कुल मिलाकर कह सकते कि तीन पंक्तियों और अल्प शब्द में रची एक विस्तृत कविता है यह हाइकु.

-बुशरा तबस्सुम
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सामयिक एवं मर्मस्पर्शी हाइकु। वर्तमान परिदृश्य को बिम्बित करती ।कोरोना महामारी के इस कठिन दौर में डॉक्टर,नर्स,पुलिस इत्यादि जिस तरह से जान हथेली पर लेकर अपने कर्तव्य पर डटे हुए है वो सभी देख रहे है। इनका डायरेक्ट कोरोना से मुकाबला है अपने इस कर्तव्य निर्वाहन के लिए कई कई दिन ये घर नही जा पा रहे है जब जाते भी ही बाहर से ही परिवार को देख लौट जाते है उनकी सुरक्षा के कारण। बेहद ही संवेदनशील दृश्य है ये ।जब छोटे बच्चे अपनी माँ को खोजते है आम दिनों से अलग है ये दृश्य। सम्भवतः माँ कुछ पल घर से आ कर बेटी को दूर से देख गयी हो उसके जाने के बाद किसी तरह भुला पुचकार कर रखी जा रही वो बच्ची घर में घूम घूम कर  माँ को खोज रही है। 
आशा जी को इस भावप्रधान,संवेदनापूर्ण हाइकु के लिए हार्दिक बधाई 

-सुनीता अग्रवाल नेह
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परिवार से बढ़कर देश को चुना एक माँ।बलिदानी माँ। संघर्ष करती माँ। अपनों और देश के प्रति अटूट प्रेम करती माँ। माँ को ढूंढ़ती बेटी हर दिल प्राणी को रुला देगा

-डा स्टेला कुजूर
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बहुत सार्थक हाइकु। समसामयिक संकट में सबसे अधिक जिम्मेदारी नर्स और डॉक्टर्स की है। नर्स का भी परिवार होता है । जब नर्स ड्यूटी पर होती है तब उसकी बेटी अपनी मां को कोने कोने में ढूंढ़ती है। मार्मिक दृश्य।

-डॉ रमा द्विवेदी, हैदराबाद
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उम्दा नर्स की कर्मठता बेटी के माध्यम से बयां

-अविनाश बागड़े
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वाह ! बहुत ही सुंदर हाइकु अपने परिवार से दूर रहकर किस तरह से अपने काम पर डटी हुई है नर्स..बखूबी दर्शाया गया हैं साथ ही बेटी का नर्स को ढूंढना बेहद हृदयस्पर्शी भाव व्यक्त कर रहा है

-अभिषेक जैन
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इस हाइकु में जो दृश्य उभर कर आया है ...उसे हर किसी ने इन दिनों चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों पर ...उनके योगदान को लेकर आ रही खबरों में अवश्य ही देखा होगा। वो दृश्य आज इस हाइकु के माध्यम से फिर सामने आ गया है

-आभा खरे
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Friday, February 08, 2019

अंक - 30

बाबा का श्राद्ध
कबाड़ी खरीदता
पुरानी खाट

-पुष्पा सिंघी

Tuesday, October 16, 2018

भरा हुआ है

भरा हुआ है
बादल के थैले में
बूँदों का रेला

-त्रिलोचना कौर

सिसकती है

सिसकती है
सफेद पत्थरों में
खामोश रात

-त्रिलोचना कौर

Sunday, September 24, 2017

छुट्टी की घंटी
बजते ही मुस्काया
नन्हा-सा बंटी

-वीना मित्तल

अंक - 28

लौट आने को
करता मनुहार
अपना गाँव

-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर