माघ महीना
हिम ढके शिखर
शिव फिर हँसे ।
-कमला रत्नम
(हाइकु पत्र 21, दिसम्बर -1983 से साभार)
पगली हवा
बतियाते न थकी
सो गये पेड़।
- डा० शैल रस्तोगी
(हाइकु पत्र 21, दिसम्बर-1983 से साभार)
किरण मिली
सतरंगी हो गयी
आँसू की बूँद।
-सुरेश वात्स्यायन
(हाइकु पत्र 21, दिसम्बर-1983 से साभार)
सूर्य सो गया
तारे गद्दी जा बैठे
जागा तो भागे।
-राधेश्याम
(हाइकु पत्र 21, दिसम्बर-1983 से साभार)
तपन देख
आँधी ने खोल दिये
वर्षा के द्वार।
-डा० वेदज्ञ आर्य
(हाइकु पत्र 22, अगस्त-1984 से साभार)
नभ-सर में
करते जल क्रीड़ा
मेघ-मतंग।
-डा० वेदज्ञ आर्य
(हाइकु पत्र 22, अगस्त-1984 से साभार)
जपा कुसुम
खिले, दहके, झरे
तुम न मिले।
-डा० सुधा गुप्ता
(हाइकु पत्र 22, अगस्त-1984 से साभार)
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