Saturday, January 14, 2012

अंक - 17


माघ महीना
हिम ढके शिखर
शिव फिर हँसे ।

-कमला रत्नम

(हाइकु पत्र 21, दिसम्बर -1983 से साभार)



पगली हवा
बतियाते न थकी
सो गये पेड़।

- डा० शैल रस्तोगी

(हाइकु पत्र 21, दिसम्बर-1983 से साभार)


किरण मिली
सतरंगी हो गयी
आँसू की बूँद।

-सुरेश वात्स्यायन

(हाइकु पत्र 21,  दिसम्बर-1983 से साभार)



सूर्य सो गया
तारे गद्दी जा बैठे
जागा तो भागे।

-राधेश्याम

(हाइकु पत्र 21, दिसम्बर-1983 से साभार)


तपन देख
आँधी ने खोल दिये
वर्षा के द्वार।

-डा० वेदज्ञ आर्य

(हाइकु पत्र 22,  अगस्त-1984 से साभार)


नभ-सर में
करते जल क्रीड़ा
मेघ-मतंग।

-डा० वेदज्ञ आर्य

(हाइकु पत्र 22,  अगस्त-1984 से साभार)


जपा कुसुम
खिले, दहके, झरे
तुम न मिले।

-डा० सुधा गुप्ता

(हाइकु पत्र 22,  अगस्त-1984 से साभार)



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